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Tuesday, August 11, 2020

राजस्थान की प्रमुख लोकदेवियां / Major folk goddesses of Rajasthan

        राजस्थान की प्रमुख लोकदेवियां/          Major folk goddesses of Rajasthan

राजस्थान की प्रमुख लोक देवियां


कुलदेवी 

जिस देवी को प्रारम्भ से मानते आ रहे है। वह कुल देवी होती हैं। यह किसी जाती, समाज, वंश, परिवार की एक ही होती है।


इष्ट / आराध्य देवी 

जिस देवी को किसी चमत्कार के कारण मानना प्रारम्भ कर देते है। वह इष्ट देवी होती हैं। यह किसी जाती, समाज, परिवार की अनेक हो सकती है।

        राजस्थान की प्रमुख लोकदेवियां


राजस्थान में अनेक देवियां हुई है जिनमे से कुछ वंश की कुल देवियां है तो कुछ अपने चमत्कारों की वजह से देवी स्वरूपा कहलाई। राजस्थान में भिन्न भिन्न समय में हुई अनेकों लोक देवियां लोगो की आस्था की केन्द्र बनी। 


केलादेवी 

👉 केला देवी का मंदिर करोली जिले में स्थित है।
👉 केला देवी यदुवंशी राजवंश की कुल देवी है ।
👉 चेत्र मास की शुक्ल अष्टमी को त्रिकुट पर्वत चोटी पर लक्की मेला भरता है।
👉 केला देवी मंदिर के सामने बोहरों की छतरी है। केला देवी का नवरात्रा में लक्की मेला भरता है जिसका मुख्य भक्तो द्वारा लांगुरिया गीत गाया जाता है। 
👉 कंस द्वारा देवकी की कन्या का वध करने पर यही कन्या केला देवी के रूप में त्रिकुट पर्वत की घाटी में विराजमान हैं।


शीला देवी ( अनुपूर्णा देवी )

👉 शीला देवी का मंदिर आमेर में स्थित है। यह कछवाह वंश की कुल देवी है।
👉 1601 सदी में आमेर राज्य के शासक मानसिंह प्रथम ने पूर्वी बंगाल की विजय के पश्चात इस देवी की जलेव चोक आमेर के राजभवन के मध्य स्थापित किया गया।
👉 शिलादेवी के मंदिर में मदिरा एवं जल को चरणामृत भक्तो की इच्छानुसार दिया जाता है।
👉 शीला देवी की मूर्ति अष्ट भूजी है। भगवती महिषासुर मृदिनी की मूर्ति के उपरी हिस्से पर पंच देवी की प्रतिमाएं उत्कीर्ण है।

करणी माता

 👉  करणी माता का मंदिर बीकानेर जिले में स्थित है। करणी माता चूहों कि देवी के रूप में प्रसिद्ध है।
👉 बीकानेर से 35 किमी. दूर देश नोक में करणी माता का मंदिर है। करणी माता चारण जाती की कुल देवी है।
👉 मारवाड़ तथा बीकानेर के राठौड़ शासक करणी माता को अपनी इष्ट देवी मानते है। 
👉 राव बीका ने बीकानेर राज्य की स्थापना करणी माता के आशीर्वाद से की।
👉 करणी माता का मंदिर में सफेद चूहे काबा कहलाते है। चारण समाज के लोग इन्हें अपना आराध्य देव मानते है इनके मंदिर को मठ कहते है।
👉 नवरात्रि में देशनोक में भव्य मेला भरता है।

जीण माता 

👉 जीण माता का मंदिर सीकर जिले में रेवासा में स्थित है।
👉 हर्ष पर्वत पर स्थित शिलालेख के अनुसार जीण माता मंदिर का निर्माण पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में करवाया गया।
👉 यह चौहानों की कुल देवी मानी जाती है। जीण माता की मूर्ति अष्टभुजी है यहां पर प्रसाद के रूप में ढाई प्याला मदिरा चढाई जाती है।
👉 जीण माता का मेला प्रतिवर्ष चैत्र व आश्विन नवरात्रों में भरता है।

बड़ली माता

👉 बड़ली माता का मंदिर चित्तौड़गढ़ जिले में छीपों के आकोला में बेड़च नदी के किनारे स्थित है।
👉 माता की तांती बांधने से बीमार व्यक्ति ठीक हो जाता है। बच्चो को दो तीबरियो से निकलने पर बीमार बच्चा अच्छा हो जाता है।


सचियाय माता का मंदिर

👉 सचियाय माता का मंदिर ओसियां जोधपुर में स्थित है।    👉  सचियाय माता ओसवालों ब्राह्मणों की कुल देवी है।        👉  इनका प्रमुख मंदिर ओसियां नामक नगर की ऊंची पहाड़ी पर स्थित है।
👉 इस मंदिर का निर्माण परमार राजा उपलदेव ने करवाया था।
👉 सचीयाय माता की वर्तमान प्रतिमा कसोरी पत्थर की है।

लटियाला (लूद्रवा) माताजी

👉 लटियाला माता का मंदिर फलोदी जोधपुर में स्थित है।  👉 यह कल्ला राठौड़ राजपूतों की कुल देवी है।
👉 इनके मंदिर के आगे खेजड़ी का वृक्ष होता है। इसलिए इन्हे खेजड़ी बेटी राय भवानी कहते है।

स्वांगिया माता

👉 स्वांगिया माता का मंदिर जैसलमेर जिले में स्थित है।
👉 जैसलमेर के राज्य चिह्न में स्वांग (भाला) को मुड़ा हुआ देवी के हाथ में दिखाया गया है।
👉 राज चिन्हनो में सबसे उपर पालम चिड़िया जिसे शकुन चीडी भी कहते है यह देवी का प्रतीक है।

त्रिपुरा सुंदरी मंदिर

👉 त्रिपुरा सुंदरी मंदिर तलवाड़ा बांसवाड़ा में स्थित है इस तरताई माता भी कहते है।
👉 पांचाल जाती के लोग इसे अपनी कुल देवी के रूप में पूजते है।
👉 मंदिर में अश्टादश भूजा की प्रतिमा स्थित है जिसके हाथ में अठारह प्रकार के आयुध पकड़े हुए है।

तनोट माता

👉 तनोट माता का मंदिर जैसलमेर में स्थित है।
👉 तनोट माता को सैनिकों की देवी के रूप में पूजा जाता है।👉  तनोट माता का मंदिर वर्तमान में सीमा सुरक्षा बल के अन्तर्गत आता है।
👉 भारत पाक सीमा पर स्थित इस मंदिर के क्षेत्र में 1965 के युद्ध में पाक द्वारा गिराए बम निष्क्रिय हो गए थे जो आज भी सुरक्षित रखे हुए है।

दधिमती माता

👉 दधिमती माता का मंदिर नागौर जिले में गोठ मांगलोद में स्थित है।
👉 यह माता दाधीच ब्राह्मणी की कुल देवी मानी जाती है। पुराणों में इसे कुशा क्षेत्र कहा गया है।
👉 पुराणों के अनुसार त्रेतायुग में विकटासुर के वध के लिए भगवती दधिमती के रूप में प्रकट हुई थी
👉 उदयपुर के महाराणा स्वरूप सिंह को पुत्र प्राप्ति दधिमती माता के आशीर्वाद से हुई।
👉 दोनों नवरात्रों में यहां विशाल मेले का आयोजन होता है।

आई माता

👉 आई माता का मंदिर बिलाड़ा जोधपुर जिले में स्थित है। आई माता बाबा रामदेव जी की शिष्या थी। आई माता को देवी मां का अवतार माना गया है।
👉 चेत्र शुक्ल द्वितीया को संवत् 1561 में आई माता का देहावसन हो गया था। सीरवी जाती के लोग आई माता को सर्वाधिक पूजते है। आई माता ने सीरवी समाज के लोगो को अपने क्षेत्र में संरक्षण दिया था।
👉 आईजी बीकाजी की पुत्री थी। आईजी ने नीम के वृक्ष के नीचे अपना पंथ चलाया था।
👉 आई माता का पूजा स्थल बडेर कहलाता है। जिसमे मूर्ति नहीं होती है। सीरवी समाज के लोग आई माता के मंदिर को दरगाह कहते है।
👉 हर महीने में शुक्ल द्वितीया को पूजा अर्चना की जाती है।  👉 बिलाड़ा में आई माता के मंदिर के दीपक की ज्योति से केसर टपकता है जिसका उपयोग इलाज के रूप में किया जाता है।

घेवर माता

👉 घेवर माता का मंदिर राजसमंद जिले में स्थित है। घेवर माता का मंदिर राजसमन्द झील के किनारे स्थित है।
👉 यह एक सती मंदिर है कहा जाता है कि राजसमंद के निर्माण में इन्हीं से पहला पत्थर रखवाया गया ।
👉 घेवर बाई मालवा क्षेत्र की रहने वाली थी। इनका वर्तमान मंदिर राजसमंद झील की पाल पर स्थित है।


सुगाली माता

👉 सुगाली माता आऊवा (पाली) के ठाकुर कुशाल सिंह चांपावत की कुल देवी मानी जाती है। माता की 54 भुजाएं तथा 10 सिर है।
👉 इस मूर्ति को 1857 की क्रांति के समय अंग्रेजो द्वारा अजमेर लाकर रखा गया जिसे वर्तमान में पाली संग्रहालय को सौंप दिया गया।

ज्वाला माता

👉 ज्वाला माता का मंदिर जोबनेर जयपुर में स्थित है।
👉 किंवदती के अनुसार जब शिवजी ने सती को कंधे पर उठाकर तांडव नृत्य किया था तो विष्णु भगवान ने अपने चक्र से सती के टुकड़े - टुकड़े कर दिए थे। जिसमे घुटना यहां पर गिर था। इसलिए इस शक्ति पीठ का अधिक महत्व है।
👉 प्रतिवर्ष नवरात्रा में यहां पर मेला आयोजित होता है।

रानी दादाजी सती माता

👉 दादी सती माता का मंदिर झुंझुनूं जिले में स्थित है। इनका नाम नारायणी बाई था।
👉 इनका विवाह तनधन दास से हुआ लेकिन उनके पति को हिसार नवाब के सैनिकों ने धोखे से मार दिया। तब नारायणी उग्र चंडिका बन गई इसके बाद 1655 में अपने पति के साथ सती हो गई।
👉 झुंझुनूं में रानी सती का विशाल संगमरमर का मंदिर बना हुआ है।
👉 लोकभाषा में दादीजी के नाम से प्रसिद्ध रानी सती का प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को मेला लगता है।
👉 रानी सती के परिवार में 13 स्त्रियां सती हुई थी जिनकी पूजा भाद्रपद कृष्णा अमावस्या को की जाती है।


सकराय माता

👉 सकराय माता का मंदिर सीकर जिले में स्थित है। अकाल पीड़ितों के लिए फल सब्जियां उत्पन करने के लिए इन्हें शाकंभरी माता कहते है।
👉 सकराय माता खंडेल वालों की कुलदेवी के रूप में विख्यात है। यहां पर चेत्र ओर आश्विन माह के नवरात्रा में मेलें लगते है।
👉 शाकंभरी माता का एक मंदिर सांभर में तथा दूसरा मंदिर सहारनपुर जिले में है।

शीतला माता

👉 शीतला माता का मंदिर जयपुर जिले के चाकसू में में स्थित है।
👉 इस मंदिर का निर्माण शील की डूंगरी पर सवाई माधोसिंह ने करवाया था।
👉 सभी देवियों में शीतला माता ऐसी देवी है जो खंडित रूप में पूजी जाती है।
👉 इस देवी का वाहन गधा है ओर पुजारी कुम्हार जाती का होता है। बांझ स्त्रियां संतान हेतु इनकी पूजा करती है।
👉 चाकसू में प्रतिवर्ष शीतला अष्टमी को शीतला माता का मेले भरता है।

नारायणी माता

👉 नारायणी माता का मंदिर 11 वी शताब्दी में प्रतिहार शैली में निर्मित है।
👉 अलवर जिले की राजगढ़ तहसील की बरवा डूंगरी पर नारायणी माता का मंदिर स्थित है।
👉 नाई जाती के लोग नारायणी माता को कुलदेवी के रूप मानते है।
👉 मीणा जाति के लोग भी इन्हें अपनी आराध्य देवी मानते है।

जिलानी माता

👉 जिलानी माता का मंदिर अलवर जिले में स्थित है।
इस मंदिर के समीप ही एक प्रसिद्ध प्राचीन बावड़ी स्थित है।
👉 प्रतिवर्ष दो बार इस मंदिर में मेला आयोजित होता है।

भदाना माता

👉 कोटा से 5 किमी दूर भदाना नामक स्थान पर माता का मंदिर है।
👉 यहां पर मुठ मारण का तांत्रिक प्रयोगों की झपट में आए व्यक्ति को मौत के मुंह से बचाया जाता है।

आवड़ माता

👉 आवड़ माता का मंदिर जैसलमेर में स्थित है। यह जोगमाया आइनाथ के रूप में पूजी जाती है।
👉 लोक मान्यता के अनुसार मामड जी चारण के घर हिंगलाज देवी की अंशावतार सात कन्याओं ने जन्म लिया था जिन्हे मुख्यत आवड़ बरबडी नाम से जाना जाता है। इन सात देवियों का मंदिर तेमेडेराय में स्थित है।
 👉 आवड़ माता अपनी बहनों के साथ लूणकरण भाटी के समय मारवाड़ में प्रवेश किया । तीन आचमन से समुद्र सुखाकर तामड़ा पर्वत पर गई वहां पर नरभक्षी राक्षस को पहाड़ से नीचे गिराकर मार दिया। तभी से वह पहाड़ तेम डी कहलाता है।
👉 चारण देवी नौ लाख तार की ऊनी साड़ी पहनती है।

नागणेचिया माता

👉 नागणेचिया माता का मंदिर बाड़मेर जिले पंचभद्रा तहसील में नगोना नामक स्थान पर है।
👉 यह राठौड़ वंश की कुल देवी मानी जाती है। राव घूहड़ ने 13 वी शताब्दी में इनका मंदिर का निर्माण करवाया था।
👉 नागणेचिया माता ही श्री चक्रेश्वरी माताजी है जिनकी मूल प्रतिमा जोधपुर दूदू में स्थित है।
👉 नागोना माता का मंदिर नागणेचिया नाम से विख्यात है।

आवेरी माता

👉 आवेरी माता का मंदिर चित्तौड़गढ़ निकुंभ में स्थित है। यहां पर पीठ, शारीरिक व्याधियों के निवारण के लिए विख्यात हैं। यहां पर लकवे का इलाज किया जाता है।

कुशालमाता

👉 कुशाल माता का मंदिर बदनोर भीलवाड़ा में स्थित है। कुशाल माता को चामुंडा देवी का अवतार माना जाता है।
👉 इस मंदिर के पास बेराठ माता का मंदिर स्थित है। जिसे जादू बेराठ भी कहा जाता है।
👉 कुशाल माता ओर बेराठ माता दोनों बहने थी।
👉 प्रतिवर्ष इनका मेला भाद्रपद ग्यारस से कृष्ण अमावस्या तक लगता है।
👉 महाराणा कुम्भा ने बदनोर पर पुन आक्रमण करने के बाद इस मंदिर का निर्माण कराया था।

बाण माता

👉 मेवाड़ की कुलदेवी (उदयपुर सिसोदिया) राजवंश की कुलदेवी है।
👉 कुंभलगढ़ दुर्ग के पास केलवाड़ा नामक स्थान पर मंदिर है

आमजा माता

👉 आमजा का मंदिर केलवाड़ा उदयपुर के पास रिझडा नामक स्थान पर है। यहां पर पूजा भील ओर ब्राह्मण द्वारा की जाती हैं
👉 प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी को भीलों का भव्य मेला लग ता है।

आशापुरा माता

👉 पोकरण के पास बिस्सा जाती के लोग आशापुरा माता को अपनी कुल देवी मानते है।
👉 आशापुरा देवी कच्छ भूज से लूनभांजे बिस्सा के साथ लगभग 1200 संवत् में पोकरण आती थी।
👉 बिस्सा जाती विवाह के पश्चात जात लगाने जाते है।
👉 प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल 10 व माघ शुक्ल 10 की मेला लगता है।

महामाया माता

👉 गर्भवती स्त्रियां अपने प्रसव को निर्विघ्न पूर्ति के लिए तथा बच्चो को स्वस्थ रखने के लिए महामाया की पूजा करते है।
👉 महामाया शिशुरक्षक लोकदेवी के रूप में पूजी जाती है।

पथवारी माता

👉 तीर्थ यात्रा की सफलता की कमाना हेतु राजस्थान में पथवारी देवी की लोकदेवी के रूप पूजा जाती है।
👉 पथवारी देवी गांव के बाहर स्थापित होती है।

▪️ नकटी माता - जयपुर के निकट भवानीपुर में नकटी माता का प्रतिहार कालीन मंदिर स्थित है।
▪️ क्षेमकरी माता - सुनारों की कुल देवी।
▪️ विरातरा माता - भोपों की कुल देवी
▪️ उंटाला माता - पुष्करणा ब्राह्मणों की कुल देवी।
▪️ अंता देवी बीकानेर - ऊंटों की देवी।
▪️ इडाना माता - अग्नि स्नान करने वाली देवी।
▪️ ब्राह्मणी माता सोरेसन बारां - ऐसी लोकदेवी जिसकी पीठ की पूजा होती है।
▪️ खलखानी माता - गधों की देवी।


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